Mahakal Bhasma Aarti: चैत्र दशमी पर बाबा महाकाल का दिव्य शृंगार; मस्तक पर 'ॐ' सजाकर दिया विश्व शांति का संदेश
उज्जैन में शनिवार सुबह 4 बजे बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई। ब्रह्म मुहूर्त में अभिषेक के बाद बाबा का निराकार से साकार रूप में शृंगार किया गया। इस बार बाबा के मस्तक पर विशेष रूप से 'ॐ' अंकित किया गया, जिसे शांति का प्रतीक मानकर वैश्विक शांति की कामना की गई।
उज्जैन : बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर बाबा के दर पर भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिली। देश-विदेश से आए श्रद्धालु शुक्रवार देर रात से ही अपने ईष्ट को देखने के लिए लंबी कतार में लगे हुए थे।
मंदिर परिसर का नजारा देखने लायक था क्योंकि भक्त बाबा की झलक देखकर हर-हर महादेव के जयकारे लगा रहे थे। शनिवार के दिन रोज की तरह सुबह 4 बजे बाबा की भस्म आरती की गई।
शनिवार की भस्म आरती बहुत खास रही, क्योंकि बाबा महाकाल ने आरती के बाद किए शृंगार में मस्तक पर ऊं लगाकर भक्तों को दर्शन दिए। बाबा के माथे पर लगा ऊं शांति का प्रतीक है, जिससे पूरे विश्व में शांति का संदेश दिया गया।
महाकाल की भस्म आरती के कुछ नियम हैं। उनके अनुसार, सबसे पहले ब्रह्म मुहूर्त में महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा पहले बाबा का जलाभिषेक किया गया और बाद में पंचामृत से स्नान करवाया गया। इस पंचामृत में शुद्ध दूध, ताजा दही, देसी घी, शक्कर, शहद और विभिन्न फलों के रस का मिश्रण शामिल था। अभिषेक के बाद भस्म आरती का भव्य आयोजन हुआ, जिसमें बाबा को भस्म चढ़ाई गई और आरती उतारी गई। इसमें महाकाल भक्तों को निराकार से साकार रूप में दर्शन देते हैं, जिसमें वो सिर्फ भस्म से स्नान करते हैं।
क्या आप WhatsApp पर न्यूज़ अपडेट पाना चाहते हैं?
WhatsApp पर ताज़ा और भरोसेमंद न्यूज़ अपडेट तुरंत पाएं। अभी जुड़ें और हर खबर सबसे पहले पढ़ें।
Follow News Tv India on WhatsAppइसके बाद महाकाल का विशेष श्रृंगार किया गया। इसमें बाबा के माथे पर ॐ लगाकर मुकुट धारण कराया गया और चांदी का सुंदर त्रिपुंड लगाया गया, जिसने उनकी शोभा को चार चांद लगा दिए। फिर फूलों की मालाएं, बेलपत्र, चंदन और अन्य पूजा सामग्री से बाबा को सजाया गया।
जब बाबा का शृंगार पूरा हो जाता है, तो भक्त उनके अद्भुत रूप के दर्शन करते हैं। बाबा के इस रूप को साकार स्वरूप माना जाता है। बाबा के इस श्रृंगार के बाद कपूर की आरती की गई और उसके बाद उन्हें भोग लगाया गया।