पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के काम करने के तरीके पर कड़ी नाराजगी जताई है। यह पूरा मामला जमीन की रजिस्ट्री पर लगने वाली फीस (स्टाम्प ड्यूटी) से जुड़े एक पुराने झगड़े का है, जो पिछले 15 सालों से सरकारी दफ्तरों और अदालतों के चक्कर काट रहा है। कोर्ट ने इस मामले में हो रही देरी और अफसरों द्वारा साफ-साफ आदेश न लिखने की वजह से पंजाब के मुख्य सचिव से जवाब माँगा है। अदालत ने यहाँ तक कहा है कि क्यों न उनके खिलाफ अदालती आदेशों की अनदेखी करने का मामला चलाया जाए।
क्या है पूरा मामला?
यह कानूनी विवाद हरप्रताप सिंह और पंजाब सरकार के बीच है। इस मामले की शुरुआत साल 2010 में हुई थी। अदालत में याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि 15 साल बीत जाने के बाद भी सरकारी अफसर इस पर कोई सही फैसला नहीं ले पाए हैं।
शुरुआत में, बड़े अफसरों ने इस केस को छोटे अफसरों के पास वापस भेज दिया था क्योंकि जमीन की सही से जाँच नहीं की गई थी। इसके बाद हाईकोर्ट ने भी पुराने गलत फैसलों को रद्द करते हुए दोबारा सुनवाई करने को कहा था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि अफसरों ने फिर वही पुरानी गलती दोहरा दी। जब इसके खिलाफ दोबारा अपील की गई, तो ऊपर बैठे अधिकारियों ने भी बिना कोई कारण बताए उस अपील को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने आदेशों को बताया अधूरा
अदालत ने जालंधर विभाग के कमिश्नर द्वारा अगस्त 2025 में दिए गए फैसले की जाँच की। कोर्ट ने पाया कि यह फैसला बहुत छोटा था और इसमें यह नहीं बताया गया था कि यह निर्णय किस आधार पर लिया गया है। कानून की नजर में ऐसा फैसला गलत माना जाता है क्योंकि इसमें अफसर ने अपनी सोच या वजह साफ नहीं की थी।
अफसरों की ट्रेनिंग और मुख्य सचिव का वादा
अदालत ने याद दिलाया कि साल 2023 में भी ऐसा ही एक मामला सामने आया था। उस समय मुख्य सचिव ने कोर्ट को भरोसा दिया था कि सभी अफसरों को ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) दी जाएगी, ताकि वे कानून के हिसाब से सही और स्पष्ट फैसले लिखना सीख सकें।
मुख्य सचिव ने फरवरी 2026 में बताया था कि पिछले कुछ सालों में कई ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए गए हैं। लेकिन कोर्ट ने पकड़ लिया कि जिस अफसर ने यह गलत फैसला सुनाया, उसे आखिरी बार 2021 में ही सिखाया गया था। 2023 के बाद उसे कोई नई जानकारी या ट्रेनिंग नहीं दी गई, जिससे कोर्ट का भरोसा टूट गया।
सरकारी लापरवाही से बढ़ रहे हैं केस
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि सरकारी अफसरों की इस सुस्त और गलत कार्यशैली की वजह से अदालतों में मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है।
-
बेवजह की कानूनी लड़ाई: जब अफसर अपनी जिम्मेदारी सही से नहीं निभाते, तो आम आदमी को मजबूरन बार-बार कोर्ट आना पड़ता है।
-
समय की बर्बादी: 15 साल तक एक छोटे से झगड़े का न सुलझना प्रशासन की बड़ी नाकामी है।
-
कानून का उल्लंघन: नियम कहते हैं कि झगड़ों का निपटारा जल्दी होना चाहिए, लेकिन यहाँ सरकार खुद देरी की वजह बन रही है।
कार्यवाही की चेतावनी और अगली सुनवाई
कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पंजाब के मुख्य सचिव को एक आखिरी मौका दिया है। उन्हें अब यह समझाना होगा कि उनके खिलाफ कड़ी कार्यवाही क्यों न की जाए। अब इस मामले की अगली सुनवाई 13 मार्च 2026 को होगी।
कानूनी जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह कड़ा रुख भविष्य में सरकारी अफसरों को अपनी जिम्मेदारी सही से निभाने के लिए मजबूर करेगा। अब अफसरों को कोई भी फैसला देने से पहले उसकी वजह विस्तार से बतानी होगी।