यूक्रेन द्वारा रूस की तेल रिफाइनरियों को निशाना बनाने के दावे के साथ वायरल हो रहा वीडियो असली नहीं है। तकनीकी जांच और फॉरेंसिक एनालिसिस में पुष्टि हुई है कि यह वीडियो एआई (Artificial Intelligence) की मदद से तैयार किया गया है।

वायरल दावा और कूटनीतिक संदर्भ

24 मार्च 2026 को इंस्टाग्राम पर 'poltical_apocalypse' नामक यूजर ने एक वीडियो पोस्ट किया जिसमें चार अलग-अलग सीसीटीवी क्लिप्स का कोलाज है। इसमें रिफाइनरियों में भीषण आग और धमाके दिखाई दे रहे हैं। दावा किया गया कि यह यूक्रेन द्वारा रूसी सीमा के काफी अंदर किए गए रणनीतिक हमलों के वास्तविक फुटेज हैं, जिनका मकसद रूस की सैन्य आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करना है। हालांकि, यूक्रेन ने वास्तव में 22 मार्च 2026 को फिनलैंड की सीमा के पास स्थित रूस के प्रिमोर्स्क तेल टर्मिनल और ऊफा शहर की रिफाइनरी पर ड्रोन हमले किए हैं, लेकिन वायरल हो रहा यह विशिष्ट वीडियो उन घटनाओं का नहीं है।

पड़ताल में सामने आई तकनीकी कमियां

वीडियो की सूक्ष्म जांच करने पर इसमें कई ऐसी विसंगतियां पाई गईं जो केवल एआई-जनित सामग्री में ही संभव हैं। वीडियो की टाइमस्टैम्प्स पूरी तरह से अतार्किक हैं, जहाँ समय आगे बढ़ने के बजाय अचानक पीछे चला जाता है। इसके अलावा, धमाके के समय भागते हुए कर्मचारियों के शरीर की बनावट और उनकी हरकतें अवास्तविक नजर आ रही हैं। 'डीपफेक्स एनालिसिस यूनिट' (DAU) के अनुसार, 0:06 से 0:08 सेकंड के बीच रिफाइनरी के पाइपों का आकार रहस्यमयी तरीके से बदल रहा है और वे धुंधले या बिगड़े हुए दिख रहे हैं।

तकनीकी जांच और एआई डिटेक्शन के नतीजे

वीडियो की सत्यता जांचने के लिए 'हाइव मॉडरेशन' (Hive Moderation) जैसे अत्याधुनिक एआई डिटेक्शन टूल का सहारा लिया गया, जिसने इस वीडियो को 95% एआई संभावित बताया।

अधिक पुष्टि के लिए 'एआईऑरनॉट' और 'साइट इंजन' जैसे फॉरेंसिक टूल्स का भी उपयोग किया गया। इन सभी तकनीकी जांचों ने स्पष्ट किया कि वीडियो के कीफ्रेम्स किसी वास्तविक कैमरे द्वारा रिकॉर्ड नहीं किए गए हैं, बल्कि एक एल्गोरिदम द्वारा तैयार किए गए हैं।

वास्तविक हमले बनाम फर्जी वीडियो

रॉयटर्स और एएफपी की रिपोर्ट्स के अनुसार, यह सच है कि यूक्रेन के बड़े ड्रोन हमलों के बाद रूस के बाल्टिक बंदरगाहों (प्रिमोर्स्क और उस्त-लुगा) ने कच्चे तेल की लोडिंग रोक दी है। इन वास्तविक हमलों के वीडियो अलजजीरा और अन्य प्रमुख मीडिया हाउस द्वारा साझा किए गए हैं, जो वायरल हो रहे सीसीटीवी फुटेज से बिल्कुल अलग हैं।

निष्कर्ष: वास्तविक युद्ध की घटनाओं का सहारा लेकर एआई के जरिए डिजिटल भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है और यह वायरल फुटेज पूरी तरह से फर्जी है।