वॉशिंगटन/नई दिल्ली : अमेरिका-ईरान युद्ध अब अपने पांचवें हफ्ते में प्रवेश कर चुका है और इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी असर दिखना शुरू हो गया है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होने और तेल टैंकरों पर हमलों के कारण कच्चा तेल 116 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँच गया है। इस संकट का सबसे क्रूर प्रहार डीजल की कीमतों पर पड़ा है, जो कई देशों में रिकॉर्ड स्तर तक महंगी हो चुकी हैं।

एशियाई और विकासशील देशों पर आर्थिक प्रहार

एशियाई अर्थव्यवस्थाएं, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर हैं, इस युद्ध की सबसे बड़ी शिकार बनी हैं। फिलीपींस में डीजल की कीमतों में युद्ध शुरू होने के बाद 81.6 प्रतिशत की अविश्वसनीय वृद्धि दर्ज की गई है। मलेशिया में डीजल 57.9 प्रतिशत और वियतनाम में 45.9 प्रतिशत महंगा हुआ है। सिंगापुर और चीन में भी कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिससे मैन्युफैक्चरिंग हब पर दबाव बढ़ गया है।

विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में संकट

ईंधन की कीमतों में उछाल ने विकासशील देशों के विदेशी मुद्रा भंडार और आम आदमी की थाली पर सीधा असर डाला है। अफ्रीका की बड़ी अर्थव्यवस्था नाइजीरिया में डीजल 78.3 प्रतिशत महंगा हो गया है। आर्थिक संकट से जूझ रहे श्रीलंका में फिर से डीजल की कीमतें 37.2 प्रतिशत बढ़ गई हैं। दक्षिण एशिया के अन्य देशों जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी ईंधन की किल्लत ने आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है।

पश्चिमी देशों और यूरोप में महंगाई का दबाव

उत्तर अमेरिका और यूरोप भी इस वैश्विक संकट से अछूते नहीं रहे हैं। परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ने से यहाँ महंगाई दर रिकॉर्ड स्तर पर है। राष्ट्रपति ट्रंप के सैन्य अभियान के बीच अमेरिकी घरेलू बाजार में डीजल 41.2 प्रतिशत महंगा हुआ है। कनाडा में भी लगभग ऐसी ही वृद्धि दर्ज की गई है। यूरोप के प्रमुख देशों जैसे जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन में बढ़ती कीमतों ने आर्थिक संतुलन बिगाड़ दिया है।

युद्ध क्षेत्र और ऊर्जा निर्भरता

युद्धग्रस्त यूक्रेन में भी डीजल की कीमतों में 33.9 प्रतिशत का भारी इजाफा हुआ है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक हॉर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही सामान्य नहीं होती, तब तक कीमतों में कमी की उम्मीद कम है। एनर्जी आयात पर निर्भर देशों में महंगाई का खतरा अब पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है।